
अविनाश धर्माधिकारी
सबसे पहले, टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में महज 24 घंटे के भीतर तीन संदिग्धों को हिरासत में लेकर महत्वपूर्ण सफलता हासिल करने के लिए मुंबई पुलिस और उसके प्रमुख, पुलिस आयुक्त, बृहन्मुंबई श्री देवेन भारती, IPS को हार्दिक बधाई। जिस तेजी से पुलिस ने इस मामले में सफलता हासिल की, वह सराहनीय है। राजस्थान पुलिस के साथ किया गया समन्वय भी प्रशंसा के योग्य है।
जरा कल्पना कीजिए कि यदि पुलिस को इस मामले में इतनी जल्दी सफलता नहीं मिलती, तो क्या स्थिति होती? सोशल मीडिया पर अटकलों, आलोचनाओं और आरोपों की बाढ़ आ जाती। मुंबई की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगते और कुछ लोग शायद गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग भी शुरू कर देते।
इतनी गंभीर घटना के बाद जनता की चिंता स्वाभाविक है। अपराध और सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे पर पुलिस को जवाबदेह होना चाहिए। लेकिन जब पुलिस अधिकारी तेजी और प्रभावी ढंग से कार्रवाई करते हैं, तो उनके काम की निष्पक्ष सराहना भी होनी चाहिए।
मेरी राय में, यह सफलता केवल फायरिंग की घटना के बाद कुछ घंटों में किए गए प्रयासों का परिणाम नहीं है। किसी मामले में इतनी जल्दी सफलता मिलने के पीछे अक्सर महीनों और वर्षों तक जुटाई गई खुफिया जानकारी, लगातार की गई जांच, पेशेवर संपर्क, तकनीकी विश्लेषण और समर्पित पुलिसिंग की भूमिका होती है।
मैं यह बात मुंबई पुलिस में अपनी सेवाएं देने और देवेन भारती साहब के करियर के विभिन्न चरणों में उनके अधीन काम करने के अनुभव के आधार पर कह रहा हूं।
मुझे उनके अधीन उस समय काम करने का अवसर मिला, जब वे डीसीपी, डिटेक्शन; अतिरिक्त पुलिस आयुक्त और संयुक्त पुलिस आयुक्त के पद पर कार्यरत थे। मैंने व्यक्तिगत रूप से उनकी कार्यशैली, बुद्धिमत्ता, संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने की क्षमता और पेशे के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को करीब से देखा है।
वे असाधारण रूप से मेहनती अधिकारी हैं। वे अपने सूचना तंत्र को विकसित करने और उसे मजबूत बनाए रखने के महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। वे केवल फाइलों, औपचारिक ब्रीफिंग या आधिकारिक व्यवस्था के माध्यम से मिलने वाली सूचनाओं पर निर्भर नहीं रहते। वे व्यक्तिगत पहल, पेशेवर संपर्कों और जमीनी स्तर पर होने वाली गतिविधियों की गहरी समझ को महत्व देते हैं।
वर्षों के दौरान उन्होंने देशभर की खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मजबूत पेशेवर संबंध विकसित किए हैं। मुंबई जैसे शहर में ऐसे संबंध बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि किसी खतरे की योजना दूसरे राज्य में बन सकती है, उसके संचालक कहीं और हो सकते हैं और घटना को अंजाम देने वाले लोगों का मुंबई से पहले कोई विशेष संबंध भी नहीं हो सकता है।
ऐसे नेटवर्क समय पर महत्वपूर्ण जानकारी और संभावित खतरे की पूर्व चेतावनी उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। जब किसी मामले की जांच राज्य की सीमाओं से आगे बढ़ती है, तब ये संपर्क पुलिस अधिकारियों को तेजी से समन्वय स्थापित करने में भी सहायता करते हैं।
उनकी एक और विशेषता, जिसे मैंने अपने अनुभव में देखा है, एक सक्षम टीम तैयार करने की उनकी क्षमता है। मेरे अनुभव के अनुसार, वे केवल कुछ चुनिंदा अधिकारियों को ही महत्व नहीं देते, बल्कि उन सभी अधिकारियों की सराहना करते हैं, जो ईमानदारी, निरंतरता और परिणामों पर स्पष्ट ध्यान केंद्रित करते हुए काम करते हैं।
पुलिस बल तब और मजबूत बनता है, जब विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले समर्पित अधिकारियों को यह विश्वास होता है कि उनके कार्यों को पहचान और सम्मान मिलेगा। जब अच्छे प्रदर्शन के आधार पर सराहना की जाती है, तो पेशेवर आत्मविश्वास और टीम भावना दोनों मजबूत होते हैं।
मुझे यह विश्वास करना अच्छा लगेगा कि मैंने भी अपने काम के माध्यम से उनका विश्वास हासिल किया था।
विशेष रूप से, जब मैं साकीनाका पुलिस स्टेशन में वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक के रूप में कार्यरत था और वे कानून एवं व्यवस्था के संयुक्त पुलिस आयुक्त थे, तब मुझे उनका प्रोत्साहन और सहयोग मिला। उनके समर्थन से मुझे अपनी जिम्मेदारियां निभाने में काफी मदद मिली।
उन्होंने 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव की घटनाओं और उसके बाद उत्पन्न परिस्थितियों से जुड़े आंदोलन को संभालने के मेरे तरीके की सराहना की थी। कानून-व्यवस्था की तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रित करने के लिए धैर्य, दृढ़ता, उचित निर्णय लेने की क्षमता और पुलिस अधिकारियों तथा जनता के साथ लगातार संवाद बनाए रखना आवश्यक होता है।
उन्होंने साकीनाका पुलिस स्टेशन के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के प्रयासों की भी सराहना की थी। इसके साथ ही, वहां तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने तथा टीम भावना को मजबूत करने के प्रयासों को भी उन्होंने महत्व दिया था।
किसी पुलिस स्टेशन की कार्यक्षमता केवल उसकी इमारत और उपकरणों पर निर्भर नहीं करती। यह उसके कर्मचारियों के आत्मविश्वास, कामकाज के माहौल, जिम्मेदारी की भावना और एक-दूसरे का सहयोग करने की तत्परता पर भी निर्भर करती है। इन पहलुओं को मिली उनकी मान्यता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण थी।
इसीलिए, आज जब मैं उनके नेतृत्व पर भरोसा जताता हूं, तो वह प्रत्यक्ष पेशेवर अनुभव पर आधारित है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि देवेन भारती साहब के नेतृत्व में मुंबई सक्षम हाथों में है।
टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में मिली सफलता का विश्लेषण
इस पृष्ठभूमि में आइए, टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में पुलिस को मिली सफलता पर विचार करें।
पुलिस की त्वरित कार्रवाई और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय उल्लेखनीय रहा। संभव है कि संदिग्धों ने सोचा हो कि मुंबई छोड़ने के बाद उन्हें गायब होने और बच निकलने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। लेकिन घटना के तुरंत बाद इतनी जल्दी उनकी गिरफ्तारी यह दर्शाती है कि समय पर मिली जानकारी और विभिन्न राज्यों की पुलिस के बीच सहयोग कितना महत्वपूर्ण होता है।
हालांकि, संदिग्ध शूटरों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करना जांच की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता है, लेकिन इससे पूरी जांच समाप्त नहीं हो जाती। साजिश का पर्दाफाश करना, इसके पीछे मौजूद संचालकों का पता लगाना, सबूत जुटाना और अदालत में प्रत्येक आरोपी की भूमिका साबित करना अभी भी एक लंबी और मेहनत भरी प्रक्रिया है।
यह अंतर शुरुआती सफलता के महत्व को कम नहीं करता। बल्कि यह याद दिलाता है कि अभी आगे कितना काम बाकी है।
क्या यह सफलता महज किस्मत का नतीजा है?
अपने अनुभव के आधार पर मेरा मानना है कि वर्षों तक लगातार की गई पुलिसिंग और जांच के कारण ही इतनी तेजी से कार्रवाई करना संभव हो पाता है।
पिछले दो वर्षों के दौरान मुंबई में लॉरेंस बिश्नोई गिरोह से जुड़े 8 से 10 गंभीर मामले सामने आए हैं। इस दौरान 65 से अधिक कथित गैंगस्टरों को गिरफ्तार कर हिरासत में रखा गया है। इनमें से कुछ लोग पुलिस के मुखबिर भी बन गए हों, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
जरा सोचिए कि गिरफ्तार संदिग्धों से पूछताछ, उनके संचार माध्यमों की जांच, वित्तीय लेन-देन का पता लगाने, तकनीकी डेटा का विश्लेषण करने और उनके सहयोगियों की पहचान करने से कितनी बड़ी मात्रा में जानकारी सामने आ सकती है।
यदि आपस में जुड़े मामलों में दर्जनों संदिग्ध गिरफ्तार किए गए हों, तो पूछताछ के दायरे में आने वाले अन्य लोगों की संख्या इससे काफी अधिक हो सकती है। मेरा 200 से 300 लोगों का अनुमान ऐसी जांच के संभावित व्यापक दायरे को समझाने के लिए है। यह इन जांचों में पूछताछ किए गए लोगों की कोई पुष्ट आधिकारिक संख्या नहीं है।
हर जांच से जानकारी का एक नया टुकड़ा सामने आ सकता है—जैसे कोई फोन नंबर, संपर्क, स्थान, वित्तीय संबंध, वाहन, ठहरने की व्यवस्था या रसद संबंधी सहायता देने वाला व्यक्ति।
अलग-अलग देखने पर इनमें से कोई जानकारी मामूली लग सकती है। लेकिन जब इसे दूसरे मामलों से मिले तथ्यों के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो यही जानकारी एक महत्वपूर्ण सुराग बन सकती है।
इसी तरह संस्थागत स्तर पर पुलिस का अनुभव और जानकारी बढ़ती है। जांचकर्ता धीरे-धीरे किसी आपराधिक नेटवर्क के काम करने के तरीके, नए लोगों को जोड़ने की प्रक्रिया, बिचौलियों और परिवहन, ठिकाने, हथियार या धन की व्यवस्था करने के तरीकों को समझने लगते हैं।
जब कोई नया अपराध होता है, तो पुलिस के पास पहले से जुटाई गई जानकारी का एक बड़ा आधार मौजूद हो सकता है। पुलिस की तेजी से कार्रवाई करने की क्षमता अक्सर ऐसे काम पर आधारित होती है, जिसके बारे में आम जनता को कभी जानकारी ही नहीं मिलती।
अपने अनुभव के आधार पर मेरा यह भी मानना है कि मुंबई पुलिस ने हाल के दिनों में अन्य आपराधिक योजनाओं को भी विफल किया हो सकता है। मैं किसी विशेष गोपनीय अभियान की जानकारी होने का दावा नहीं कर रहा हूं। मेरा आशय केवल यह बताना है कि अपराध रोकने के लिए की जाने वाली पुलिस की कार्रवाई अक्सर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा नहीं बनती।
संवेदनशील जानकारी हमेशा सार्वजनिक नहीं की जा सकती। ऐसा करने से किसी मुखबिर की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, निगरानी अभियान प्रभावित हो सकता है या जांच के दायरे में मौजूद लोगों को सतर्क होने का अवसर मिल सकता है।
इस कारण जनता आम तौर पर अपराध होने और उसके बाद गिरफ्तारियों की खबर देखती है। लेकिन किसी अपराध को अंजाम दिए जाने से पहले ही उसे रोकने के लिए की गई कार्रवाई की जानकारी शायद कभी सामने नहीं आती।
पुलिस के प्रदर्शन का मूल्यांकन करते समय इस अदृश्य कार्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मुंबई में संगठित अपराध का इतिहास और वर्तमान चुनौती
इस विषय को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी देखना जरूरी है।
1990 के दशक के दौरान मुंबई को डी-कंपनी, छोटा राजन, अरुण गवली, अमर नाइक, एजाज लकड़ावाला और रवि पुजारी जैसे अपराधियों से जुड़े संगठित आपराधिक नेटवर्कों की चुनौती का सामना करना पड़ा। हालांकि, इन सभी की गतिविधियों और प्रभाव का समयकाल अलग-अलग रहा।
इन नेटवर्कों की मुंबई में गहरी जड़ें थीं। इनकी ताकत स्थानीय गुर्गों, मुखबिरों, रिश्तेदारों, समर्थकों, वित्तीय संपर्कों और विशेष इलाकों की जानकारी रखने वाले लोगों से आती थी।
स्थानीय नेटवर्क उन्हें सूचनाएं जुटाने, जरूरी व्यवस्थाएं करने और पीड़ितों को डराने-धमकाने में मदद करते थे। उनका प्रभाव लंबे समय से स्थापित मौजूदगी और समय के साथ विकसित हुए संपर्कों पर आधारित था।
मुंबई के बाहर से आने वाले किसी आपराधिक नेटवर्क के सामने शहर में अपनी जड़ें जमाने की चुनौती कुछ अलग होती है।
मुझे उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहे बबलू श्रीवास्तव के नेटवर्क से जुड़ी मुंबई में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशें याद हैं। मेरे आकलन में, शहर में पर्याप्त मजबूत स्थानीय संपर्कों का अभाव उसके लिए मुंबई के कुछ पुराने गिरोहों जैसी गहरी पैठ बनाना कठिन बनाने वाला एक कारक था।
मुझे लॉरेंस बिश्नोई नेटवर्क के मामले में भी एक प्रासंगिक समानता दिखाई देती है।
इस नेटवर्क की उत्पत्ति मुंबई के बाहर हुई है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि शहर में इसके स्थानीय संपर्क नहीं हैं या यह मुंबई में लोगों को अपने साथ नहीं जोड़ सकता। कोई बाहरी गिरोह बिचौलियों, अस्थायी रूप से भर्ती किए गए लोगों और स्थानीय स्तर पर सहायता देने वालों का इस्तेमाल कर सकता है। फिर भी, एक स्थायी और भरोसेमंद आपराधिक नेटवर्क खड़ा करना एक अलग चुनौती है।
भर्ती किया गया प्रत्येक व्यक्ति, किया गया हर लेन-देन और स्थानीय स्तर पर की गई हर व्यवस्था पुलिस के लिए सुराग बनने की संभावना भी पैदा करती है।
मुंबई पुलिस जितनी प्रभावी ढंग से इन संपर्कों की पहचान करेगी, इस नेटवर्क के लिए शहर में अपनी गतिविधियां चलाना उतना ही कठिन होता जाएगा।
मेरे आकलन में, पिछली जांचों के दौरान जुटाई गई खुफिया जानकारी मुंबई में इस गिरोह की गतिविधियों की गुंजाइश को काफी हद तक सीमित कर सकती है। मजबूत खुफिया तंत्र, लगातार निगरानी और समय पर कार्रवाई से इस गिरोह की शहर में स्थायी पैठ बनाने की कोशिशों को बाधित किया जा सकता है।
इसीलिए मैं टाइगर श्रॉफ फायरिंग मामले में पुलिस को मिली त्वरित सफलता को वर्षों के अनुभव, पेशेवर दक्षता, अंतरराज्यीय सहयोग और समर्पण का परिणाम मानता हूं।
पीड़ितों को न्याय और अपराधियों के पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई जरूरी
इसके साथ ही हमें फायरिंग की घटना में घायल हुए लोगों को भी याद रखना चाहिए। वे हमारी चिंता, सहयोग और शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाओं के हकदार हैं। हर जांच का अंतिम उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
पुलिस की कार्रवाई का लक्ष्य केवल उन लोगों को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, जिन पर हमले को अंजाम देने का संदेह है। इसके साथ ही साजिश रचने, आर्थिक मदद देने, सहायता उपलब्ध कराने और निर्देश देने वाले सभी लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सबूत जुटाना तथा उन्हें उचित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना भी जरूरी है।
मैं ईमानदारी से उम्मीद करता हूं कि मुंबई में इस नेटवर्क की ओर से होने वाला यह आखिरी ऐसा हमला साबित हो। यह मेरी आशा और अपेक्षा है, न कि ऐसी भविष्यवाणी जिसकी कोई गारंटी दे सकता हो।
देवेन भारती साहब के नेतृत्व में काम करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि मुझे उम्मीद है कि वे जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने और उनके आपराधिक नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और समर्थन की आवश्यकता है।
मुंबई पुलिस पहले भी संगठित अपराध की बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना कर चुकी है। उसकी ताकत हमेशा समर्पित अधिकारियों, विश्वसनीय खुफिया जानकारी, टीमवर्क और जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के दृढ़ संकल्प पर निर्भर रही है।
वर्तमान मामले में मिली सफलता की सराहना भी इसी भावना के साथ की जानी चाहिए।
मैं देवेन भारती, IPS, जांच में जुटे सभी अधिकारियों, मुंबई पुलिस के सहयोगी कर्मचारियों और राजस्थान पुलिस की टीम को हृदय से बधाई देता हूं, जिनके सहयोग से संदिग्धों को गिरफ्तार करने में मदद मिली।
